उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mohabbaton ka azab maine ghamon ki surat chuka diya hai

मोहब्बतों का 'अज़ाब मैं ने ग़मों की सूरत चुका दिया है

محبتوں کا عذاب میں نے غموں کی صورت چکا دیا ہے

शायर: Umood Abrar Ahmad9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मोहब्बतों का 'अज़ाब मैं ने ग़मों की सूरत चुका दिया है
न छेड़ मुझ को ऐ मेरे दुश्मन कि मैं ने ख़ुद को मिटा दिया है

अदा-ए-दिल में गुलों की ख़ुशबू महक रही है 'अज़ाब बन कर
ये दिल का सौदा किया है तू ने कि दिल को मजनूँ बना दिया है

तड़प के मैं ने जो तेरी यादों का दिल में अपने गुलाब रक्खा
न दिल ही महका न ये चमन ही जो याद था सब भुला दिया है

ये हिज्र और ये विसाल दोनों तुम्हारे होने से मुंसलिक थे
ये पर्दा-पोशी जो दरमियाँ थी हिजाब किस ने उठा दिया है

कमाल ये था कि जिस की ख़ातिर ज़माने वालों से लड़ पड़ी मैं
उसी ने दामन को छेद डाला उसी ने दिल वर्ग़ला दिया है

तमाम वा'दे वफ़ा करेंगे ये तय हुआ था सो इस लिए भी
वफ़ा की रह में मैं झुक गई थी चराग़-ए-दिल को बुझा दिया है

क़दम क़दम पर अज़िय्यतों के निशाँ मिले थे चहार-जानिब
मैं सू-ए-मक़्तल चली गई थी ये किस ने क़िस्सा सुना दिया है

मैं राह-ए-हक़ से भटक गई थी न कोई मंज़िल थी न निशाँ था
दिल-ए-शिकस्ता की ख़ैर जिस ने चराग़ शब का जला दिया है

'उमूद' सोई रही मैं शब भर 'अजीब हलचल मची हुई थी
कि क़हर बरपा हुआ था शब को ये ख़्वाब किस ने दिखा दिया है