उर्दू शायरी · ग़ज़ल

miT gain tarikiyan dasht-o-daman raushan hua

मिट गईं तारीकियाँ दश्त-ओ-दमन रौशन हुआ

مٹ گئیں تاریکیاں دشت و دمن روشن ہوا

शायर: Zafar Mirzapuri8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मिट गईं तारीकियाँ दश्त-ओ-दमन रौशन हुआ
सुब्ह-दम ख़ुर्शीद का जब पैरहन रौशन हुआ

हिज्र के मारे दिलों को आया राहत का पयाम
जब कभी मीरा के होंटों पर भजन रौशन हुआ

क़तरा क़तरा क़ैस के अश्कों का तारा बन गया
एक वहशी का करम सारा गगन रौशन हुआ

जल्वा-ए-महबूब तेरे हुस्न का है ये कमाल
वो किरन फूटी कि अरमाँ का चमन रौशन हुआ

मिल गईं अहल-ए-ख़िरद को ज़िंदगी की राहतें
और पए अहल-ए-जुनूँ दार-ओ-रसन रौशन हुआ

दौर-ए-नौ में भी क़लम ने ऐसा फ़न दिखला दिया
'इश्क़ की दुनिया में जैसे कोहकन रौशन हुआ

पेश करते हैं उन्हें अपनी 'अक़ीदत का सलाम
जिन शहीदों के लहू से ये वतन रौशन हुआ

क्यूँ अकेले-पन की ज़ुल्मत का गिला कीजे 'ज़फ़र'
जब उन्हीं लम्हों में कोई सीम-तन रौशन हुआ