उर्दू शायरी · ग़ज़ल

meri nigah nai aab-o-tab dekhti hai

मिरी निगाह नई आब-ओ-ताब देखती है

مری نگاہ نئی آب و تاب دیکھتی ہے

शायर: Babar Zuhrab7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मिरी निगाह नई आब-ओ-ताब देखती है
कभी सितारा कभी माहताब देखती है

मैं उस की नींद से दिल में उतरना चाहता हूँ
ख़ुदा का शुक्र कि वो लड़की ख़्वाब देखती है

ज़मीं पे आ के ये ख़ल्क़-ए-ख़ुदा ब-नाम-ए-ख़ुदा
ख़राब हो के जहान-ए-ख़राब देखती है

फ़क़त मुझे ही वो दरिया नज़र नहीं आता
कि रेग-ए-सहरा भी अक्सर सराब देखती है

बशर को ख़्वाब दिखाती है और ख़्वाबों में
ख़ुदा की आँख नया इंक़िलाब देखती है

क़लम दवात मिरे मुंतज़िर हैं मुद्दत से
किताब उठाऊँ कि मुझ को किताब देखती है

कभी चली नहीं 'ज़हराब' वो हवा मुझ में
जो शाख़ शाख़ महकते गुलाब देखती है