उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek ek lafz ko bartun gar ehtimam se main

इक एक लफ़्ज़ को बरतूँ गर एहतिमाम से मैं

اک ایک لفظ کو برتوں گر اہتمام سے میں

शायर: Babar Zuhrab7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इक एक लफ़्ज़ को बरतूँ गर एहतिमाम से मैं
मक़ाम अपना बना सकता हूँ कलाम से मैं

वगरना उस की नज़र मुझ पे पड़ गई होती
ख़ुदा का शुक्र पुकारा गया न नाम से मैं

जवाब में मुझे मिलती है रात की कालक
सवाल करता हूँ जब भी चराग़-ए-शाम से मैं

इसी लिए तो मुक़द्दर पे नाज़ है मुझ को
कि बादशाह बनाया गया ग़ुलाम से मैं

लगा रहा हूँ सदा अपने दिल के ऐवाँ में
बुला रहा हूँ तुझे कितने एहतिराम से मैं

वो आग मुझ में भड़कती है जाँ तड़कती है
जो आग ले गया जलते हुए ख़ियाम से मैं

समझ रहा था कि 'ज़हराब' हूँ मगर फिर भी
निकल सका न मोहब्बत तुम्हारे दाम से मैं