उर्दू शायरी · ग़ज़ल

koi tabir mere KHwab mein dar aai hai

कोई ता'बीर मिरे ख़्वाब में दर आई है

کوئی تعبیر مرے خواب میں در آئی ہے

शायर: Babar Zuhrab6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कोई ता'बीर मिरे ख़्वाब में दर आई है
जल-परी जिस तरह तालाब में दर आई है

क्या ज़मीं और ज़माने का सफ़र था दुश्वार
क्यों थकन वक़्त के आ'साब में दर आई है

देखता रहता हूँ मैं जानिब-ए-अफ़्लाक कि अब
उस की सूरत भी तो महताब में दर आई है

बात में ज़हर मिलाया है इसी दूरी ने
तल्ख़ी-ए-हिज्र अदब-आदाब में दर आई है

ये नदी जिस में मिरी बस्तियाँ बह जाएँगी
है ये सैलाब कि सैलाब में दर आई है

वो घड़ी जिस ने बढ़ाया है मोहब्बत का वक़ार
देख ले अब तिरे 'ज़हराब' में दर आई है