उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mil ke yun sab ke samne mat kar KHajil mujhe

मिल के यूँ सब के सामने मत कर ख़जिल मुझे

مل کے یوں سب کے سامنے مت کر خجل مجھے

शायर: Maham Haya Safdar7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मिल के यूँ सब के सामने मत कर ख़जिल मुझे
तू सब से मिल रहा है सो हरगिज़ न मिल मुझे

मौजूदगी मिरी न खुली तुझ पे वर्ना तो
लाया है बारहा तिरी जानिब ये दिल मुझे

बाम-ए-ख़याल पर मिरे आती हैं तितलियाँ
आता है याद जब भी तिरा शोख़ तिल मुझे

शौक़-ए-मुसाफ़िरत हो तिरी ख़ैर क्या करूँ
इक आँख कर के बैठी है फिर पा-ब-गिल मुझे

जी चाहता है नोच लूँ दीवार-ओ-दर के नक़्श
करती है बे-रुख़ी यूँ तिरी मुश्त'इल मुझे

अब ऐ निगार-ए-वक़्त कोई शर्त ही नहीं
तू 'आरज़ी मिले या मिले मुस्तक़िल मुझे

रश्क-ए-जहान होती मिरे ज़ख़्म की नुमूद
मिलता 'हया' जो मौसम-ए-गुल मो'तदिल मुझे