उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek diye ke waste har-su hawa-e-pesh-o-pas

इक दिए के वास्ते हर-सू हवा-ए-पेश-ओ-पस

اک دیے کے واسطے ہر سو ہوائے پیش و پس

शायर: Maham Haya Safdar9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इक दिए के वास्ते हर-सू हवा-ए-पेश-ओ-पस
शहर में फैली हुई है बस फ़ज़ा-ए-पेश-ओ-पस

कर मिरी मौजूदगी को कारगर मेरे लिए
ऐ ख़ुदा-ए-लम-यज़ल ऐ मावरा-ए-पेश-ओ-पस

आ नहीं पाता तज़लज़ुल आरज़ू-ए-वस्ल में
वाहिमा तख़्लीक़ कर दे इक बराए पेश-ओ-पस

'इश्क़ की पहली नज़र हम से ख़फ़ा है आज और
दिल में बरपा है हमारे कर्बला-ए-पेश-ओ-पस

शाख़-ए-दिल से झड़ने लगते हैं समर उम्मीद के
ख़ामुशी में गूँजती है जब सदा-ए-पेश-ओ-पस

रख न पाया फिर सफ़र जारी मुसाफ़िर वक़्त का
थी किसी मज़बूत लहजे में नवा-ए-पेश-ओ-पस

आप की उल्फ़त में हम साबित-क़दम क्यूँकर रहें
आप ने बख़्शा ही क्या हम को सिवाए पेश-ओ-पस

इस तसलसुल से खुला है रंग-ए-दो-'आलम कि अब
नाम ही दिल का नहीं दिल है सरा-ए-पेश-ओ-पस

आप के होते हुए मा'दूम हम होने लगे
पेश-ओ-पस है सर-बसर बस इंतिहा-ए-पेश-ओ-पस