उर्दू शायरी · ग़ज़ल

abr ko rokte hain aab talab karte hain

अब्र को रोकते हैं आब तलब करते हैं

ابر کو روکتے ہیں آب طلب کرتے ہیں

शायर: Maham Haya Safdar9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अब्र को रोकते हैं आब तलब करते हैं
दश्त सादा हैं कि तालाब तलब करते हैं

मस्ख़रे-पन की भी हद होती है कोई या'नी
लोग दरियाओं से सैलाब तलब करते हैं

उन को है अपने नज़ारों की सजावट से ग़रज़
खिड़कियों वाले तो महताब तलब करते हैं

हम कि कर लेते हैं सूराख़ सफ़ीने में ख़ुद
हम कि ख़ुद बहर में गिर्दाब तलब करते हैं

उन को मग़्मूम तनफ़्फ़ुस में सुकूँ मिलता है
अहल-ए-दिल ख़ुद दिल-ए-बेताब तलब करते हैं

कल तलक सब्ज़ नज़ारों में नुमायाँ थे मियाँ
हम जो अब दीदा-ए-ख़ूँ-नाब तलब करते हैं

अब थकन जान-कनी के है मुमासिल ठहरी
अब तिरा लम्स ये आ'साब तलब करते हैं

इस में अब ज़र्द ज़मानों का धुआँ उड़ता है
आप जिस दिल से तब-ओ-ताब तलब करते हैं

हाथ मलते हैं 'हया' आँख की 'उर्यानी पर
हम जो हर शब से नया ख़्वाब तलब करते हैं