उर्दू शायरी · ग़ज़ल

maut ka kuchh KHiraj tha bhi nahin

मौत का कुछ ख़िराज था भी नहीं

موت کا کچھ خراج تھا بھی نہیں

शायर: Kamal Hatvi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मौत का कुछ ख़िराज था भी नहीं
उस से अच्छा इलाज था भी नहीं

दिल पे ही रोके ज़िंदगी के वार
और कुछ मुझ पे आज था भी नहीं

सुन के हर बात अन-सुनी करना
ये तुम्हारा मिज़ाज था भी नहीं

उस ने पल भर में मुझ को छोड़ दिया
इश्क़ में ये रिवाज था भी नहीं

इश्क़ ने ही किया उसे तख़्लीक़
वर्ना पहले समाज था भी नहीं

चारासाज़ों ने ज़हर ही लिक्खा
और कोई इलाज था भी नहीं

इश्क़ में कल सिवाए रोने के
दूसरा काम-काज था भी नहीं