उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ab koi chaara-saz hai bhi nahin

अब कोई चारा-साज़ है भी नहीं

اب کوئی چارہ ساز ہے بھی نہیں

शायर: Kamal Hatvi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

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अब कोई चारा-साज़ है भी नहीं
छोड़ो उम्र-ए-दराज़ है भी नहीं

सोचता हूँ बता ही दूँ सब को
अब तिरा राज़ राज़ है भी नहीं

'मीर' की इस ग़ज़ल में बस तुम हो
दूसरा नीम-बाज़ है भी नहीं

आप जब चाहें तोड़ सकते हैं
दिल पे अब मुझ को नाज़ है भी नहीं

ग़म ग़लत हो गए हों या मौला
वर्ना अब तो मजाज़ है भी नहीं

ज़िंदगी ख़ुद रियाज़ है अपना
और कोई रियाज़ है भी नहीं