उर्दू शायरी · ग़ज़ल

manzar dhundhle raushaniyan maddham hoti hain

मंज़र धुँधले रौशनियाँ मद्धम होती हैं

منظر دھندھلے روشنیاں مدھم ہوتی ہیں

शायर: Umair Najmi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मंज़र धुँधले रौशनियाँ मद्धम होती हैं
आँखें वैसे ठीक हैं शायद नम होती हैं

दरिया थोड़ी हूँ जो अपना रस्ता बदलूँ
सहरा की बुनियादें मुस्तहकम होती हैं

रोना हो तो तन्हा होना शर्त नहीं है
ये बरसातें अक्सर बे-मौसम होती हैं

जो भी फ़ैसला करना हो बस जल्दी करना
मुझ जैसे लोगों की 'उम्रें कम होती हैं

बाप का कंधा तोड़ न दे ये छोटा ताबूत
ये छोटी लाशें भारी-भरकम होती हैं

ख़ामोशी तरतीब में रखती है आवाज़ें
वर्ना ये आवारा बे-हंगम होती हैं

'इश्क़ में क्या तय्यारी क्या मंसूबा-बंदी
ये उन चीज़ों में है जो यकदम होती हैं