उर्दू शायरी · ग़ज़ल

manazir-e-shab-e-rafta KHayal-o-KHwab hue

मनाज़िर-ए-शब-ए-रफ़्ता ख़याल-ओ-ख़्वाब हुए

مناظر شب رفتہ خیال و خواب ہوئے

शायर: Lais Quraishi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मनाज़िर-ए-शब-ए-रफ़्ता ख़याल-ओ-ख़्वाब हुए
वो अश्क थे कि सितारे सभी ख़राब हुए

वो ना-ख़ुदा कि ख़ुदाई का जिन को दा'वा था
सफ़ीने उन की हिमाक़त से ज़ेर-ए-आब हुए

हम अहल-ए-दर्द ज़माने के हाथ क्या आते
कि हम तो अपने लिए भी न दस्तियाब हुए

तलाश-ए-जाम-ए-तरब में कहाँ कहाँ न गए
पिए बग़ैर भी हम तो बहुत ख़राब हुए

हम उन के ऐब को क्या और क्यूँ अयाँ करते
जो बे-ज़मीर थे वो ख़ुद ही बे-नक़ाब हुए

फ़रेब ही से नवाज़ा है उन रफ़ीक़ों ने
मिरी जनाब में आ कर जो बारयाब हुए

तमाम उम्र मज़ाक़-ए-जुनूँ जो रखते थे
रह-ए-ख़िरद में वही लोग कामयाब हुए

हमारा सब्र है बे-इंतिहा तो हैरत क्या
कि 'लैस' हम पे सितम भी तो बे-हिसाब हुए