उर्दू शायरी · ग़ज़ल

maine tamam umr ka KHaka nigal liya

मैं ने तमाम 'उम्र का ख़ाका निगल लिया

میں نے تمام عمر کا خاکہ نگل لیا

शायर: Habib.I.Kinkhabwala4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मैं ने तमाम 'उम्र का ख़ाका निगल लिया
दो पल की भाग-दौड़ में रस्ता निगल लिया

रूहें बदन की क़ैद में यूँ हो रहीं फ़ना
जैसे की गर्म रेत ने दरिया निगल लिया

आग़ोश में छुपा के हमें पूछती है वो
सूरज ने कैसे चाँद का हिस्सा निगल लिया

आँखें निचोड़ने से भी आँसू नहीं गिरा
कुछ इस तरह से आप का सदमा निगल लिया