उर्दू शायरी · ग़ज़ल

itni shadid dhup thi ab ke bahaar mein

इतनी शदीद धूप थी अब के बहार में

اتنی شدید دھوپ تھی اب کے بہار میں

शायर: Habib.I.Kinkhabwala5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इतनी शदीद धूप थी अब के बहार में
जलने लगे थे फूल तिरे इंतिज़ार में

जितनी कमी लगी थी दिए को हवा की बस
उतनी कमी रही थी तिरे ए'तिबार में

मा'लूम है हमें कि किसी और की है वो
फिर भी हराम-ख़ोर खड़े हैं क़तार में

ज़िल्लत-भरी नज़र से हमें देखता है अब
शीशा जो रख दिया है तुम्हारे दयार में

मैं ने नसीब छान के देखा मगर मुझे
मिलती नहीं है चीज़ कभी एक बार में