उर्दू शायरी · ग़ज़ल

main ki subh-e-gham ka malal bhi nahin kar saka

मैं कि सुब्ह-ए-ग़म का मलाल भी नहीं कर सका

میں کہ صبح غم کا ملال بھی نہیں کر سکا

शायर: Nadeem Malik5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मैं कि सुब्ह-ए-ग़म का मलाल भी नहीं कर सका
तिरे बा'द ख़ुद का ख़याल भी नहीं कर सका

था 'उरूज मुझ को विसाल-रुत में बहार की
तिरे हिज्र से मैं सवाल भी नहीं कर सका

जो बिखर गया दिल-ए-ना-तवाँ के ख़याल में
उसे यकजा तेरा विसाल भी नहीं कर सका

तिरे हुक्म पर हुआ सर क़लम मिरा दोस्ता
सो मैं तुझ को वाक़िफ़-ए-हाल भी नहीं कर सका

हुआ मुंतशिर तुझे सोच सोच के इस लिए
मैं 'नदीम' ख़ुद को निढाल भी नहीं कर सका