उर्दू शायरी · ग़ज़ल

main KHush nahin hun magar do hazar das tak tha

मैं ख़ुश नहीं हूँ मगर दो हज़ार दस तक था

میں خوش نہیں ہوں مگر دو ہزار دس تک تھا

शायर: Umair Najmi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मैं ख़ुश नहीं हूँ मगर दो हज़ार दस तक था
मिरा किसी से त'अल्लुक़ उसी बरस तक था

'अजीब वक़्त प काटा था उस ने रब्त का पेड़
जब उस पे बीसियों फल थे फलों में रस तक था

मक़ाम-ए-वस्ल से आगे कोई सड़क ही नहीं
तो क्या जुनून का रस्ता फ़क़त हवस तक था

वो मिल गया है पर अब क्या करूँ तज़ब्ज़ुब है
मिरा गुमाँ तो फ़क़त उस पे दस्तरस तक था

खुली फ़ज़ा में वो डर था कि पर खुले ही नहीं
'अजब यक़ीन-ए-तहफ़्फ़ुज़ दर-ए-क़फ़स तक था

ये और बात कि फिर खुल गए सभी के लिए
तू दिल के बंद किवाड़ों पे पहली दस्तक था

बदन बना न सके कुछ अगरचे उन के पास
जुनूँ के रंग थे ख़ल्वत का कैनवस तक था

वो मुख़्तसर सी निशस्त इक तवील 'अर्से बा'द
मुकालिमा जो सुनो ठीक हो से बस तक था