उर्दू शायरी · ग़ज़ल

main KHud ko jitna rota ja raha hun

मैं ख़ुद को जितना रोता जा रहा हूँ

میں خود کو جتنا روتا جا رہا ہوں

शायर: Balwan Singh Azar6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मैं ख़ुद को जितना रोता जा रहा हूँ
कमाल-ए-ज़ब्त होता जा रहा हूँ

मुझे दरकार था सैलाब मेरा
जहाँ कुछ है डुबोता जा रहा हूँ

कोई फिर मेरा अपना हो रहा है
किसी से हाथ धोता जा रहा हूँ

भरा है ख़्वाहिशों की पोटली से
बदन का बोझ ढोता जा रहा हूँ

तक़ाज़ा है सँभलने का मुझे और
मैं अपना होश खोता जा रहा हूँ

उड़ेगी फ़स्ल हर इक सम्त मेरी
हवा में ख़ुद को बोता जा रहा हूँ