उर्दू शायरी · ग़ज़ल

main kab se dar-ba-dar hun mujhko dar dikha

मैं कब से दर-ब-दर हूँ मुझ को दर दिखा

میں کب سے در بہ در ہوں مجھ کو در دکھا

शायर: Parul Singh Noor5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मैं कब से दर-ब-दर हूँ मुझ को दर दिखा
बहुत हुआ तो आख़िर-ए-सफ़र दिखा

सुना है चूम लो तो ज़ख़्म भरते हैं
है दिल पे ज़ख़्म मेरे चूम कर दिखा

जिसे लिहाज़ कह के बाँधता है तू
मुझे तो उस नज़र में महज़ डर दिखा

यूँ दूर दूर से तसल्ली तो न दे
गले लगा ले बाहों का असर दिखा

बहकना मेरा तेरे हाथ में है अब
जो मय न हो निगाह का हुनर दिखा