उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mai bhi hai saghar bhi hai saqi bhi paimana bhi hai

मय भी है साग़र भी है साक़ी भी पैमाना भी है

مے بھی ہے ساغر بھی ہے ساقی بھی پیمانہ بھی ہے

शायर: Sabir Abuhari8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मय भी है साग़र भी है साक़ी भी पैमाना भी है
देखना ये है कि हम में ज़ौक़-ए-रिंदाना भी है

रक़्स-ए-परवाना भी देख ऐ चश्म-ए-इबरत ये भी देख
शम्अ की आग़ोश में कुछ ख़ाक-ए-परवाना भी है

हम ने माना है सुकूँ दामान-ए-साहिल में मगर
फ़ितरत-ए-अहल-ए-जुनूँ तूफ़ाँ से टकराना भी है

ऐ तलबगार-ए-मसर्रत ये भी सोचा है कभी
इक मसर्रत अपने दिल को ग़म से बहलाना भी है

जिस ने जो चाहा उसे समझा किया ऐ हम-नशीं
ज़िंदगानी इक हक़ीक़त भी है अफ़्साना भी है

अहल-ए-दिल के वास्ते है बहर-ए-ऐश-ओ-इम्बिसात
गो ब-ज़ाहिर बज़्म-ए-हस्ती एक ग़म-ख़ाना भी है

दो घड़ी ऐ गर्दिश-ए-अय्याम बस रुक जा यहीं
साक़ी-ए-रा'ना भी है गर्दिश में पैमाना भी है

जल्वा-आरा ज़र्रे ज़र्रे में है नूर-ए-बर्क़-ए-तूर
लेकिन ऐ 'साबिर' कहीं ज़ौक़-ए-कलीमाना भी है