उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mahshar mein haal dil ka KHuda ko sunaenge

महशर में हाल दिल का ख़ुदा को सुनाएँगे

محشر میں حال دل کا خدا کو سنائیں گے

शायर: Daniyal Haider Jafri13 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

महशर में हाल दिल का ख़ुदा को सुनाएँगे
चुप-चाप उस के बा'द जहन्नुम में जाएँगे

सज्दे की जब कहीं भी तमन्ना हुई हमें
हर बार तेरा नक़्श-ए-कफ़-ए-पा बनाएँगे

सोचा न था कि पहलू से लग कर रक़ीब के
इस नाज़ और अदा से वो महफ़िल में आएँगे

मेहंदी को पीसने की वो ज़हमत करेंगे क्यों
हाथों पे मेरे ख़ून की मेहंदी रचाएँगे

इक रोज़ घर से निकलेंगे मेरी तलाश में
अफ़सोस पर वो मेरा निशाँ तक न पाएँगे

घूमेगी ये ज़मीन भी उल्टी इसी के साथ
कूज़े को रख के चाक पे ऐसा घुमाएँगे

मस्ती में जो ये नाचते फिरते हैं आज-कल
कल को ये अपने गिर्द ज़माना नचाएँगे

जिस रोज़ मिल गया हमें उस का कोई निशाँ
पहले तो तेरा नक़्श-ए-कफ़-ए-पा मिटाएँगे

मरने को एक शर्त पे तय्यार हूँ कि आप
महशर में मुझ को अपना ही कह कर उठाएँगे

तब तक न चैन पाएँगे रिंद-ए-ख़राब-हाल
जब तक न जाम साक़ी-ए-कौसर पिलाएँगे

आबाद बस्तियों से हमें क्या ग़रज़ कि हम
'आशिक़ हैं जा के दश्त में ख़ेमा लगाएँगे

फ़रहाद तुझ से लोग ज़माने में अब कहाँ
अब कौन हैं जो दूध की नहरें बहाएँगे

'हैदर' जो दुश्मनान-ए-सुख़न हैं वो देखियो
आ कर मिरे मज़ार पे ग़ज़लें सुनाएँगे