उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mahfil saji thi raat ghazal ki nigah se

महफ़िल सजी थी रात ग़ज़ल की निगाह से

محفل سجی تھی رات غزل کی نگاہ سے

शायर: Zafar Mirzapuri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

महफ़िल सजी थी रात ग़ज़ल की निगाह से
ख़ुश थी मिरी हयात ग़ज़ल की निगाह से

वाक़िफ़ तो पहले हो लें मिज़ाज-ए-ग़ज़ल से आप
वर्ना न होगी बात ग़ज़ल की निगाह से

फ़ुर्क़त अलम के फूल नज़र आएँगे तुम्हें
देखोगे तुम जो रात ग़ज़ल की निगाह से

तन्हाइयों में बारहा पूछा हयात ने
पाओगे कब नजात ग़ज़ल की निगाह से

रिश्ता है इस का सब से ये सब की 'अज़ीज़ है
पूछें न ज़ात-पात ग़ज़ल की निगाह से

अफ़्कार के गुलाब से ख़ुश-रंग हो गए
सजते हैं काग़ज़ात ग़ज़ल की निगाह से

वो सुर्ख़-रू हुआ है हर इक सिंफ़ में 'ज़फ़र'
खाई न जिस ने मात ग़ज़ल की निगाह से