उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mana ki musafir hain jahan-e-guzaran hum

माना कि मुसाफ़िर हैं जहान-ए-गुज़राँ हम

مانا کہ مسافر ہیں جہان گزراں ہم

शायर: Lais Quraishi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

माना कि मुसाफ़िर हैं जहान-ए-गुज़राँ हम
मा'लूम तो हो हम को कि आख़िर हैं कहाँ हम

क्या कोई जहन्नम था पस-ए-पर्दा-ए-अफ़्कार
इक लम्स-ए-गुरेज़ाँ से हुए शो'ला-ब-जाँ हम

दुनिया हो कोई ख़्वाब कि अफ़्साना हो लेकिन
ये हम को यक़ीं है कि नहीं वहम-ओ-गुमाँ हम

इस वज़' से जीना कोई आसान नहीं था
गुज़रे न किसी तौर किसी पर भी गिराँ हम

ऐ रौशनी-ए-फ़िक्र-ओ-नज़र तेरी बदौलत
सूरज न सही फिर भी हैं 'आलम पे 'अयाँ हम

दुनिया को भी देखेंगे जो फ़ुर्सत हुई हम को
फ़िलहाल तो हैं अपनी ही जानिब निगराँ हम

ये दर्द की ने'मत जो मयस्सर है न होती
रहते जो जहाँ में सिफ़त-ए-अहल-ए-जहाँ हम

ऐ 'इश्क़ जो होगा तिरी 'अज़्मत के मुनाफ़ी
अपनाएँगे भूले से न वो तर्ज़-ए-बयाँ हम

लिखते हैं वही शे'र निकलता है जो दिल से
दोहराते नहीं 'लैस' हदीस-ए-दिगराँ हम