उर्दू शायरी · ग़ज़ल

log kya kya guftugu ke darmiyan khulne lage

लोग क्या क्या गुफ़्तुगू के दरमियाँ खुलने लगे

لوگ کیا کیا گفتگو کے درمیاں کھلنے لگے

शायर: Zaheer Ahmad7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

लोग क्या क्या गुफ़्तुगू के दरमियाँ खुलने लगे
ज़िक्र-ए-याराँ चल पड़ा तो राज़दाँ खुलने लगे

फिर पड़ाओ डल गए यादों के शाम-ए-हिज्र में
और फ़सील-ए-शहर-ए-जाँ पर कारवाँ खुलने लगे

तंग शहरों में खुले सागर की बातें क्या चलीं
बाद-ए-हिजरत चल पड़ी और बादबाँ खुलने लगे

जब से दिल का आइना शफ़्फ़ाफ़ रखना आ गया
मेरी आँखों पर कई 'अक्स-ए-निहाँ खुलने लगे

दिल की शिरयानों में ताज़ा ग़म इक ऐसे जम गया
सब पुराने ज़ख़्म-हा-ए-बे-निशाँ खुलने लगे

तेरे ग़म का मुहर-बस्ता गोश्वारा क्या खुला
'उम्र भर के दफ़्तर-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ खुलने लगे

मुद्दतों से हमनशीं थे हम-निशात-ओ-हम-तरब
मुब्तला-ए-ग़म हुआ तो मेहरबाँ खुलने लगे