उर्दू शायरी · ग़ज़ल

lekin tujh par khulta kab hai

लेकिन तुझ पर खुलता कब है

لیکن تجھ پر کھلتا کب ہے

शायर: Vibha Jain 'Khwaab'5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

लेकिन तुझ पर खुलता कब है
मेरी चुप का जो मतलब है

ऊब चुका है ये हर शय से
दिल की हालत ग़ौर-तलब है

ज़ीस्त ये क्या है कुछ भी नहीं बस
डोर-ए-नफ़स पर इक कर्तब है

इश्क़-क़फ़स में क़ैद परिंदा
हो के रिहा भी उड़ता कब है

इन आँखों की नज़र उतारो
इन में क़ैद पिया की छब है