उर्दू शायरी · ग़ज़ल

lahu mein ho ke koi tar-ba-tar bhi aaega

लहू में हो के कोई तर-ब-तर भी आएगा

لہو میں ہو کے کوئی تر بہ تر بھی آئے گا

शायर: Raees Manzar7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

लहू में हो के कोई तर-ब-तर भी आएगा
ये जंग है यहाँ नेज़े पे सर भी आएगा

मुझे इस अंधे कुएँ से निकालने के लिए
मिरे ख़ुदा कोई लश्कर इधर भी आएगा

इसी उमीद ने रक्खा है हम को गर्म-ए-सफ़र
कि रास्ते में कभी अपना घर भी आएगा

हमारे बा'द ख़ुदा जाने इस ख़राबे में
हमारे जैसा कोई बे-ख़बर भी आएगा

अगर न कोहर ने सूरज का रास्ता रोका
नई सहर का उजाला इधर भी आएगा

यक़ीन है जहाँ आया है मेरी हार का ज़िक्र
वहाँ हवाला-ए-फ़त्ह-ओ-ज़फ़र भी आएगा

कभी छटेगी ये ना'रों की धुंद भी 'मंज़र'
जो सोचते हैं उन्हें कुछ नज़र भी आएगा