उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kyon kisi aur ka aise mein bhala ho jae

क्यों किसी और का ऐसे में भला हो जाए

کیوں کسی اور کا ایسے میں بھلا ہو جائے

शायर: Umood Abrar Ahmad7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क्यों किसी और का ऐसे में भला हो जाए
नक़्श-ए-पा चूम के निकलूँ तो क़ज़ा हो जाए

मेरी क़िस्मत में अगर नाम न शामिल हो तिरा
फिर ये ताख़ीर का लम्हा भी जुदा हो जाए

काश ऐसा हो कि मंज़र में निखार आ जाए
काश ऐसा हो मिरा ख़्वाब हरा हो जाए

ज़िंदगी दश्त-नवर्दी में गुज़ारी मैं ने
और वो कहता है दिल दश्त-ज़दा हो जाए

सोचते सोचते इस कार-ए-अज़िय्यत के तुफ़ैल
आइना-ख़ाना-ए-हैरत में ख़ला हो जाए

उन को इस दिल की उदासी की ख़बर है ही नहीं
जो ये कहते हैं कि हर ख़्वाब मिरा हो जाए

देखने वालों को कुछ कह भी नहीं सकते 'उमूद'
कौन कब उन से मिले उन पे फ़िदा हो जाए