उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kya kashish allah re duniya-e-ab-o-gil mein hai

क्या कशिश अल्लाह रे दुनिया-ए-आब-ओ-गिल में है

کیا کشش اللہ رے دنیائے آب و گل میں ہے

शायर: Sabir Abuhari7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क्या कशिश अल्लाह रे दुनिया-ए-आब-ओ-गिल में है
ता-अबद जीने की ख़्वाहिश हर बशर के दिल में है

बीत जाए क्या ख़ुदा जाने जहान-ए-शौक़ पर
वो तो कहिए लैला-ए-हुस्न-ए-अज़ल महमिल में है

कुछ हमीं पहचानते हैं रू-ए-ताबाँ को तिरे
ज़िक्र तेरे हुस्न का कहने को हर महफ़िल में है

काश ये खुल जाए तुझ पर ऐ असीर-ए-आब-ओ-गिल
इक सुरूर-ए-बे-कराँ तस्ख़ीर-ए-आब-ओ-गिल में है

कोई महरम ही नहीं जब राज़-हा-ए-इश्क़ का
हम किसी को क्या बताएँ क्या हमारे दिल में है

इश्क़ ने तय कर लिए हफ़्त-आसमाँ मुद्दत हुई
अक़्ल-ए-नादाँ गुम अभी तक जादा-ए-मंज़िल में है

रहज़न-ए-होश-ओ-ख़िरद है ये जहान-ए-रंग-ओ-बू
ख़ुद से बेगाना है 'साबिर' जो भी इस महफ़िल में है