उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kuchh gham ka gham hua na KHushi ki KHushi hui

कुछ ग़म का ग़म हुआ न ख़ुशी की ख़ुशी हुई

کچھ غم کا غم ہوا نہ خوشی کی خوشی ہوئی

शायर: Sabir Abuhari8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कुछ ग़म का ग़म हुआ न ख़ुशी की ख़ुशी हुई
किस राहत-ओ-सुकूँ से बसर ज़िंदगी हुई

उस बे-नवा गदा को शहंशाह जानिए
जिस को नसीब दौलत-ए-दीवानगी हुई

कैसे शब-ए-फ़िराक़ कटी कुछ न पूछिए
इक दास्ताँ है रंज-ओ-अलम से भरी हुई

सज्दे को सर झुका दिया अपने ही पाँव पर
मुझ को जब अपनी ज़ात से कुछ आगही हुई

ख़ुद अपने हुस्न की भी न वो ताब ला सका
जिस आदमी के क़ल्ब में कुछ रौशनी हुई

साक़ी तिरे करम की तो कुछ इंतिहा नहीं
ये और बात कम न मिरी तिश्नगी हुई

फ़ुर्क़त में भी नसीब है मुझ को नशात-ए-क़ुर्ब
दिल में किसी की याद है ऐसी बसी हुई

'साबिर' ज़बाँ पे हर्फ़-ए-शिकायत न ला सका
उस की सरिश्त में है क़नाअ'त भरी हुई