उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kuchh aise mahfil mein apni jaanib sabhi ka wo dhyan khinchta hai

कुछ ऐसे महफ़िल में अपनी जानिब सभी का वो ध्यान खींचता है

کچھ ایسے محفل میں اپنی جانب سبھی کا وہ دھیان کھینچتا ہے

शायर: Jaani Lakhnavi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कुछ ऐसे महफ़िल में अपनी जानिब सभी का वो ध्यान खींचता है
बिना इजाज़त के जैसे जिस्मों से इक मलक जान खींचता है

वो और होंगे हैं जिन की आँखों में ख़्वाब आज़ाद आसमाँ के
हम अपनी ज़ंजीर ख़ुद बनाते हैं हम को ज़िंदान खींचता है

वजूद अपना ख़याल है तो अदम है अपनी ख़याली मंज़िल
दलील होने की जब नहीं है तो कैसा इम्कान खींचता है

हमारी मर्ज़ी की राह है ये हमें ख़बर है कि इस सफ़र में
किसी को दार-ओ-रसन पे शिकवा किसी को इरफ़ान खींचता है

हसीन मंज़र हमेशा हद्द-ए-नज़र से बाहर रहे हैं मेरे
मैं राएगानी को जी रहा हूँ मुझे बयाबान खींचता है

इक-आध काफ़िर भी मुझ को 'जानी' मिले हैं सेहन-ए-हरम में आ कर
इक-आध ऐसे मिले जिन्हें बुत-कदे में ईमान खींचता है