उर्दू शायरी · ग़ज़ल

koi payam-e-musalsal hai shor-e-dariya bhi

कोई पयाम-ए-मुसलसल है शोर-ए-दरिया भी

کوئی پیام مسلسل ہے شور دریا بھی

शायर: Lais Quraishi10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कोई पयाम-ए-मुसलसल है शोर-ए-दरिया भी
तही-सुख़न से नहीं है सुकूत-ए-सहरा भी

फ़ज़ा-ए-दश्त में अहल-ए-जुनूँ के हंगामे
हमें तो रास न आई मगर ये दुनिया भी

ज़मीन-ए-तिश्ना-ए-दहन की सदा तो आई थी
मगर ये बात कि अब्र-ए-बहार बरसा भी

ये बू-ए-गुल भी परेशाँ बहुत हुई लेकिन
बहुत हुआ मिरी आवारगी का चर्चा भी

किया है फ़त्ह कोई लम्हा-ए-वफ़ा जब से
मिरी गिरफ़्त में इमरोज़ भी है फ़र्दा भी

अभी तो तिश्ना-लबी के सुरूर में गुम हैं
हम अहल-ए-ज़र्फ़ करेंगे कभी तक़ाज़ा भी

जहाँ को देखने वाली हज़ार आँखें हैं
इन्हीं में होगी कहीं कोई चश्म-ए-बीना भी

जो बे-हुनर हैं वो शाइस्ता-ए-गुनाह नहीं
गुनाह करने में इक शर्त है सलीक़ा भी

अजीब आलम-ए-बेगांगी में आ निकले
गराँ गुज़रती है दिल पर तिरी तमन्ना भी

जो मिल रहा था ब-ज़ाहिर बड़े ख़ुलूस के साथ
जनाब-ए-'लैस' ने उस आदमी को समझा भी