उर्दू शायरी · ग़ज़ल

koi achchha nahin KHandan mein mere

कोई अच्छा नहीं ख़ानदाँ में मिरे

کوئی اچھا نہیں خانداں میں مرے

शायर: Habib.I.Kinkhabwala5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कोई अच्छा नहीं ख़ानदाँ में मिरे
डोर भिड़ती रही आसमाँ में मिरे

उस का दर भी खुला का खुला रह गया
और चिट्ठी पड़ी है मकाँ में मिरे

मैं भी जी भर के कुछ देर रो लूँ मगर
कोई मरता नहीं ख़ानदाँ में मिरे

एक मैला-बदन भी चलेगा मुझे
रूह टिकती नहीं इस मकाँ में मिरे

सैंकड़ों हैं मरे सैंकड़ों हैं जिए
एक तू ही नहीं इस जहाँ में मिरे