उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kisi guman kisi imkan ka ruKH nahin karti

किसी गुमाँ किसी इम्काँ का रुख़ नहीं करती

کسی گماں کسی امکاں کا رخ نہیں کرتی

शायर: Lais Quraishi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

किसी गुमाँ किसी इम्काँ का रुख़ नहीं करती
निगाह जल्वा-ए-अर्ज़ां का रुख़ नहीं करती

बसी हुई है जो आबादियों में बर्बादी
जुनूँ की मौज बयाबाँ का रुख़ नहीं करती

सबा को फ़स्ल-ए-बहाराँ से क्या मिला आख़िर
वो गुल खिले कि गुलिस्ताँ का रुख़ नहीं करती

हिसार-ए-वक़्त में अपना वुजूद है महबूस
असीरी अब रह-ए-ज़िंदाँ का रुख़ नहीं करती

मिरे 'अज़ीज़ों में रुस्वा मिरी रिफ़ाक़त है
जभी ये हल्क़ा-ए-याराँ का रुख़ नहीं करती

फ़ज़ा तो नूर-ए-सदाक़त से जगमगाती है
ये रौशनी दिल-ए-इंसाँ का रुख़ नहीं करती

वो कुछ नहीं कोई फ़र्सूदा सी रिवायत है
वो फ़िक्र जो नए 'उनवाँ का रुख़ नहीं करती

हवा भी कितनी ज़माना-शनास है ऐ 'लैस'
हर एक सेहन-ए-गुलिस्ताँ का रुख़ नहीं करती