उर्दू शायरी · ग़ज़ल

khelunga phir kabhi koi daw visal par

खेलूँगा फिर कभी कोई दाव विसाल पर

کھیلوں گا پھر کبھی کوئی داؤ وصال پر

शायर: Jaani Lakhnavi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

खेलूँगा फिर कभी कोई दाव विसाल पर
फ़िलहाल मुनहसिर हूँ मैं अपने मलाल पर

सूरत नहीं उरूज की सब कुछ तिलिस्म है
दुनिया की नींव रक्खी गई है ज़वाल पर

देखा है जब से उस ने नतीजा उड़ान का
ख़ुद ही कुतर दिए हैं परिंदे ने बाल-पर

ठोकर पे रख न दे तिरे सिक्कों को बादशाह
दरवेश आ रहा है अब अपने कमाल पर

इक टक न देखिए कि इसे टूटना भी है
रह-रह के डाला कीजे निगाहें सिफ़ाल पर

वहशत की कश्तियों पे हैं 'जानी' सवार और
आमादा हो रही हैं ये लहरें उछाल पर