उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHayal-e-husn-e-be-misal dastaras mein aa gaya

ख़याल-ए-हुस्न-ए-बे-मिसाल दस्तरस में आ गया

خیال حسن بے مثال دسترس میں آ گیا

शायर: Jaani Lakhnavi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़याल-ए-हुस्न-ए-बे-मिसाल दस्तरस में आ गया
ख़ुदी पे इख़्तियार मेरा पेश-ओ-पस में आ गया

यहीं कहीं पे आख़िरी पड़ाव ज़िंदगी का है
तुम्हारा सोग आज लहजा-ए-जरस में आ गया

नज़र को फेर कर असीर-ए-दर्द कर गए हो तुम
मैं इक परिंद-ए-बे-नवा किसी क़फ़स में आ गया

वो रास्तों के पेच-ओ-ख़म सँवारता चला गया
इधर भी हौसला सा कुछ नफ़स नफ़स में आ गया

चमन चमन ख़िज़ाँ की रुत का हम-सफ़र बना रहा
कुछ ऐसा रंग गुलिस्ताँ के ख़ार-ओ-ख़स में आ गया

वो मुम्किनात का सफ़र जो तय किया गया नहीं
गुमान से निकल गया है अब हवस में आ गया

यक़ीन से है बाला-तर कि आज तक दिल-ए-‘उमर’
किसी के बस का था नहीं किसी के बस में आ गया