उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHauf sa ek dil pe tari hai

ख़ौफ़ सा एक दिल पे तारी है

خوف سا ایک دل پہ طاری ہے

शायर: Yaseen Ansari7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़ौफ़ सा एक दिल पे तारी है
मुज़्तरिब ज़िंदगी हमारी है

ज़ुल्म होता है बे-गुनाहों पर
सिलसिला आज भी ये जारी है

कब समझते हैं क़ौम का वो दर्द
क़ौम की जिन पे ठेके-दारी है

कौन कहता है पड़ गया हल्का
झूट पर सच तो अब भी भारी है

बात तुझ से अदब की क्या करना
माल-ओ-दौलत का तू पुजारी है

माल में तेरे माल-दार-ए-वक़्त
मुफ़लिसों की भी हिस्से-दारी है

दोस्त सब के नहीं हैं हम 'यासीन'
जिस से यारी है उस से यारी है