उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kaise kah dun mahaz mujh pe ilzam hai

कैसे कह दूँ महज़ मुझ पे इल्ज़ाम है

کیسے کہہ دوں محض مجھ پے الزام ہے

शायर: Lokesh Tripathi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कैसे कह दूँ महज़ मुझ पे इल्ज़ाम है
उस की तहरीर में मेरा भी नाम है

आदमी को बहुत भाव मत दीजिए
आगे क़ुदरत के हर आदमी 'आम है

दोस्ती तो करो तुम शजर से किसी
छाओं में उस की जन्नत सा आराम है

हो गए हैं वो अंदर से ख़ाली बहुत
कह रहे थे जो कल तक बहुत काम है

रखना मुश्किल है महफ़ूज़ ईमान को
आज कल इस का सब से अधिक दाम है