उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kai payam bara-e-sukun-e-jaan to mile

कई पयाम बरा-ए-सुकून-ए-जाँ तो मिले

کئی پیام برائے سکون جاں تو ملے

शायर: Lais Quraishi11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कई पयाम बरा-ए-सुकून-ए-जाँ तो मिले
मगर तमाम हुई अपनी दास्ताँ तो मिले

कोई तो समझे मिरे कर्ब का लब-ओ-लहजा
ये आरज़ू है मुझे कोई हम-ज़बाँ तो मिले

कोई फ़ज़ा कोई मौसम हो हम से हो मंसूब
बहार अगर नहीं मिलती हमें ख़िज़ाँ तो मिले

मक़ाम-ए-शुक्र है मेरे लिए कि आख़िर-कार
मिरे हरीफ़ों में कुछ अहल-ए-ख़ानदाँ तो मिले

हूँ ग़म-नसीब तो क्या ग़म कि राह-ए-हस्ती में
तलाश-ए-हक़्क़-ओ-सदाक़त में हमरहाँ तो मिले

यही बहुत है ख़िज़ाँ को ख़िज़ाँ जो कहते हैं
कुछ ऐसे फूल हमें ज़ेब-ए-गुलसिताँ तो मिले

शिकस्ता-पा हैं तो क्या हम तो सर के बल जाएँ
मगर ये बात कोई मीर-ए-कारवाँ तो मिले

हिकायत-ए-दिल-ए-दर्द-आश्ना सुनाऊँगा
तिरी नज़र से मुझे जुरअत-ए-बयाँ तो मिले

ये ज़िंदगी के बयाबाँ में धूप का सहरा
कहाँ क़याम करूँ कोई साएबाँ तो मिले

ये रोज़-ओ-शब भी हमारे बदल तो सकते हैं
कभी ज़मीन से आ कर ये आसमाँ तो मिले

रिहा हुए हैं मगर 'लैस' ये रिहाई क्या
क़फ़स से छूटने वालों को आशियाँ तो मिले