उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kahan gai wo raushni wo ratjage kahan gae

कहाँ गई वो रौशनी वो रतजगे कहाँ गए

کہاں گئی وہ روشنی وہ رت جگے کہاں گئے

शायर: Faisal Mahmood7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कहाँ गई वो रौशनी वो रतजगे कहाँ गए
चराग़ जाने क्या हुए वो ताक़चे कहाँ गए

ज़मीन उन को खा गई कि आसमाँ निगल गया
जो हारते कभी न थे वो हार के कहाँ गए

वतन को छोड़ते समय कोई तो हम को रोकता
वो मिन्नतें कहाँ गईं वो वास्ते कहाँ गए

बुरा लगे न आप को तो एक बात पूछ लूँ
मिरे तो ख़ैर आप थे पर आप के कहाँ गए

हमें तो कुछ ख़बर नहीं कि हम कहाँ हैं आज-कल
हमें तो होश भी नहीं कि आबले कहाँ गए

मैं सोचता ही रह गया वो लोग जाने क्या हुए
मैं देखता ही रह गया कि क़ाफ़िले कहाँ गए

यहाँ बड़ा हुजूम था यहीं कहीं थीं रौनक़ें
वो दोस्ती कहाँ गई वो राब्ते कहाँ गए