उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bich saDak par uljhan mein hain jaise bhaTke hote hain

बीच सड़क पर उलझन में हैं जैसे भटके होते हैं

بیچ سڑک پر الجھن میں ہیں جیسے بھٹکے ہوتے ہیں

शायर: Faisal Mahmood5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बीच सड़क पर उलझन में हैं जैसे भटके होते हैं
हम ने ऐसा क्यों नहीं सोचा रस्ते रस्ते होते हैं

मैं हूँ मेरी तन्हाई है और इक मेरा साया है
कोई अपना साथ नहीं है जैसे अपने होते हैं

मुझ को अच्छा कहने वाले शायद तुझ को 'इल्म नहीं
पहले पहले मिलने वाले सारे अच्छे होते हैं

जितना मुमकिन हो सकता था ख़ुद को रस्ता दिखलाया
आख़िर हम पर भेद खुला कुछ लोग ही अंधे होते हैं

गलियों गलियों फिरने से कब 'इश्क़ मुकम्मल होता है
मंज़िल उन को मिलती है जो एक ही दर के होते हैं