उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hum KHud ko pukaren bhi to aksar nahin aate

हम ख़ुद को पुकारें भी तो अक्सर नहीं आते

ہم خود کو پکاریں بھی تو اکثر نہیں آتے

शायर: Faisal Mahmood5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हम ख़ुद को पुकारें भी तो अक्सर नहीं आते
अंदर ही पड़े रहते हैं बाहर नहीं आते

लाते हैं किसी अश्क-ए-मोहब्बत का सँदेसा
ऐसे तो तिरी छत पे कबूतर नहीं आते

मैं गर्द-ए-सफ़र ओढ़ के लौटा हूँ तिरी सम्त
वर्ना मिरे जैसे कभी मुड़ कर नहीं आते

इक सोच हमें खींच के लाई है यहाँ तक
कुछ सोच के दहलीज़ के अंदर नहीं आते

ये मैं हूँ शब-ए-तार है ये जलता हुआ दिल
अब ख़्वाब तुम्हारे मुझे यकसर नहीं आते