उर्दू शायरी · ग़ज़ल

achchha to hai magar hamein achchha nahin laga

अच्छा तो है मगर हमें अच्छा नहीं लगा

اچھا تو ہے مگر ہمیں اچھا نہیں لگا

शायर: Faisal Mahmood7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अच्छा तो है मगर हमें अच्छा नहीं लगा
ये शहर जिस में कोई भी अपना नहीं लगा

मरने के इंतिज़ार में बैठे थे आज भी
नंबर तो लग रहे थे पर अपना नहीं लगा

कैसे उठाए फिरते हैं जिस्मों का बोझ सब
हम को तो दिल का बोझ भी हल्का नहीं लगा

अब हाथ मत लगा यूँही उखड़ा रहे ये रंग
ऐ ज़िंदगी तू अब मुझे चूना नहीं लगा

बैठे हुए हैं ख़ाक पे ख़ल्वत की छाओं में
सहरा भी मेरे जैसों को सहरा नहीं लगा

हम ही समझ सके न कभी ज़िंदगी को यार
जब तक तुम्हारी तार से झटका नहीं लगा

अपनी जहाँ पहुँच थी वहाँ तक पहुँच गए
ये और बात है अभी कतबा नहीं लगा