उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aflak chirti hui aage nikal gai

अफ़्लाक चीरती हुई आगे निकल गई

افلاک چیرتی ہوئی آگے نکل گئی

शायर: Faisal Mahmood5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अफ़्लाक चीरती हुई आगे निकल गई
फिर आह इक मक़ाम पे जा कर सँभल गई

बस देखते ही देखते ये हादिसा हुआ
गाड़ी ही इतनी तेज़ थी सपने कुचल गई

मैं ने तमाम 'उम्र मोहब्बत में काट दी
बल भी नहीं गया मिरा रस्सी भी जल गई

इस रेत जैसी ज़िंदगी को सोचता हूँ अब
कितनी बची ये हाथ में कितनी फिसल गई

कल शब यहाँ पे क्या हुआ दुनिया को क्या ख़बर
तन्हाई मुझ को भूक से ज़िंदा निगल गई