उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kabhi na ashk bahae bhale hi ghaw gire

कभी न अश्क बहाए भले ही घाव गिरे

کبھی نہ اشک بہائے بھلے ہی گھاؤ گرے

शायर: Faizan Umar6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कभी न अश्क बहाए भले ही घाव गिरे
मुझे पसंद नहीं आँख पर तनाव गिरे

जमे हैं बर्फ़ के मानिंद अश्क आँखों में
टपक पड़ेंगे अगर रंज के अलाव गिरे

असर फ़िराक़ का होगा नया नया हम पर
निशान पड़ते हैं मिट्टी पे जब दबाव गिरे

मिरी कमी से उसे फ़र्क़ भी न था जैसे
फ़'ऊ के वज़्न पे लफ़्ज़-ए-ख़ुदी की वाव गिरे

शजर का 'इश्क़ नहीं उस को फल का बोझ कहो
अगर ज़मीं की तरफ़ शाख़ का झुकाव गिरे

ग़िज़ा बनाई है इंसाँ ने मछलियाँ कितनी
तो क्या बुरा है समुंदर में एक नाव गिरे