उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kabhi muqaddar jo ye inayat kare to kya ho

कभी मुक़द्दर जो ये इनायत करे तो क्या हो

کبھی مقدر جو یہ عنایت کرے تو کیا ہو

शायर: Rafia Zainab5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कभी मुक़द्दर जो ये इनायत करे तो क्या हो
बिछड़ के मुझ से वो मेरी चाहत करे तो क्या हो

वो जिस की सोहबत मुझे सुहूलत से मिल गई है
वो शख़्स मुझ से अगर मोहब्बत करे तो क्या हो

तमाम शिकवों को मेरे हँस कर मिटा रहा है
कभी वो मुझ से कोई शिकायत करे तो क्या हो

जो हँस के राज़ी रहे ख़ुदा की हर इक रज़ा में
फिर ऐसा बंदा कभी बग़ावत करे तो क्या हो

ख़ुदा के हामी जो मुझ से बिगड़े हैं सोच रक्खें
वो रोज़-ए-महशर मिरी हिमायत करे तो क्या हो