उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ho chuka khel ye asbab uThao jao

हो चुका खेल ये अस्बाब उठाओ जाओ

ہو چکا کھیل یہ اسباب اٹھاؤ جاؤ

शायर: Rafia Zainab4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हो चुका खेल ये अस्बाब उठाओ जाओ
कोई उम्मीद न अब मुझ को बँधाओ जाओ

है यही रस्म-ए-मोहब्बत कि अचानक बिछड़ो
तुम मुझे कोई सबब भी न बताओ जाओ

मुझ में अब कोई नई बात नहीं मिलने की
अब कहीं और ही तुम दिल को लगाओ जाओ

तुम से पहले के भी आशिक़ हुए अशआ'र में दफ़्न
अपने हिस्से की ग़ज़ल मुझ से लिखाओ जाओ