उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ab kahan wo waqt ke be-laus yari chahiye

अब कहाँ वो वक़्त के बे-लौस यारी चाहिए

اب کہاں وہ وقت کے بے لوث یاری چاہیئے

शायर: Rafia Zainab5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अब कहाँ वो वक़्त के बे-लौस यारी चाहिए
उम्र के इस दौर में अब ज़िम्मेदारी चाहिए

वस्ल-ओ-फुर्क़त के तिलिस्मी दाएरों से टूट कर
अब रिफ़ाक़त में हमें कुछ पाएदारी चाहिए

यूँ नहीं के सब्र की तल्क़ीन कर के चल दिए
चारागर हैं तो मुसलसल ग़म-गुसारी चाहिए

किस क़दर हैं लोग मेरे हाल पर मातम-कुनाँ
शक्ल पर अपनी भी कुछ तो सोगवारी चाहिए

हम-सफ़र चुनना भी है इक कारोबार-ए-ज़िंदगी
सो हमें आशिक़ नहीं इक कारोबारी चाहिए