उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kab sath apne mujhko meri zat le gai

कब साथ अपने मुझ को मिरी ज़ात ले गई

کب ساتھ اپنے مجھ کو مری ذات لے گئی

शायर: Vikas Sharma Raaz5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कब साथ अपने मुझ को मिरी ज़ात ले गई
कुछ दिन निगल गया मुझे कुछ रात ले गई

जिस के नसीब में था मैं आख़िर उसे मिला
शह चाहती थी मुझ को मगर मात ले गई

शिकवा जवाब-ए-शिकवा हुआ और चल दिए
ताख़ीर हम से लुत्फ़-ए-मुलाक़ात ले गई

अब मैं हूँ और मेरे सफ़ेद-ओ-सियाह हैं
वो सब्ज़ सुर्ख़ रंग तो बरसात ले गई

मैं ने अभी चुनी ही थीं दो चार सीपियाँ
इक लहर आई और मुझे साथ ले गई