उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kab phul khilen shaghl chhiDe jama-dari ka

कब फूल खिलें शग़्ल छिड़े जामा-दरी का

کب پھول کھلیں شغل چھڑے جامہ دری کا

शायर: Aal-e-Raza Raza7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कब फूल खिलें शग़्ल छिड़े जामा-दरी का
दीवानों को चस्का है इसी ख़ुश-ख़बरी का

सोए थे सर-ए-शाम खुली पिछले पहर आँख
मुँह देख के उट्ठे हैं चराग़-ए-सहरी का

कुछ अपनी तरफ़ मेरी निगाहों से भी देखो
इस रुख़ से भी इक बाब खुले ख़ुद-निगरी का

ना-साज़ हवा-ए-पर-ए-परवाज़ न हो जाए
मौसम तो गया ख़ैर से बे-बाल-ओ-परी का

ये चाँद ये सूरज ये अंधेरा ये उजाला
मुँह देख रहा है सफ़री हर सफ़री का

क़ाएम नहीं रहती हैं किसी शय पे निगाहें
अब कोई ठिकाना है परेशाँ-नज़री का

फ़ितरत ही से मिलती है 'रज़ा' दाद-ए-सुख़न भी
जब फ़र्ज़ अदा होता है पैग़ाम्बरी का