उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kandhon pe zindagi ki saliben liye hue

काँधों पे ज़िंदगी की सलीबें लिए हुए

کاندھوں پہ زندگی کی صلیبیں لئے ہوئے

शायर: D. Raj Kanwal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

काँधों पे ज़िंदगी की सलीबें लिए हुए
ग़म फिर रहे हैं मेरा पता पूछते हुए

रहबर भी राहज़न भी हैं लोगों की भीड़ में
आओ चलें इधर से उधर देखते हुए

हो आए जब ग़ुरूर कभी ख़ुद पे आप को
सूरज को देख लेना कहीं डूबते हुए

पहली सी अंजुमन में रही बात अब कहाँ
जी डर रहा है अब तो यहाँ बोलते हुए

अफ़सोस काट दी है यूँही ज़िंदगी तमाम
दुनिया से जा रहे हैं यही सोचते हुए

आख़िर यहीं मिलेगा तुम्हें दिल के आस-पास
सदियों से फिर रहे हो जिसे ढूँडते हुए

लो वो भी कह रहे हैं 'कँवल' बेवफ़ा मुझे
गुज़री है एक 'उम्र जिन्हें पूजते हुए