उर्दू शायरी · ग़ज़ल

junun bigDi hui haalat ke banne ka guman kab tak

जुनूँ बिगड़ी हुई हालत के बनने का गुमाँ कब तक

جنوں بگڑی ہوئی حالت کے بننے کا گماں کب تک

शायर: Aal-e-Raza Raza7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जुनूँ बिगड़ी हुई हालत के बनने का गुमाँ कब तक
गिरेबाँ जा चुका कब का रहेंगी धज्जियाँ कब तक

मोहब्बत-ना-शनासों में मोहब्बत की फ़ुग़ाँ कब तक
न जाने कट के दिल से काम देगी अब ज़बाँ कब तक

तहय्या कर चुके जिस बेवफ़ा को भूल जाने का
उसी की याद आख़िर दिल में लेगी चुटकियाँ कब तक

इधर तिनका उठाया और उधर फिर बर्क़ ने पूछा
कि फिर तय्यार हो जाएगा बन कर आशियाँ कब तक

खुले कुछ पैकर-ए-उम्मीद या ये वहम मिट जाए
नज़र आएँगी धुंदली धुंदली सी परछाइयाँ कब तक

तुम्हारी आस पर किस किस तरह दिल को न समझाया
मगर ये एहतिमाम-ए-ख़ुद-फ़रेबी मेहरबाँ कब तक

'रज़ा' कब से यही फ़रियाद है बाग़-ए-तमन्ना की
मुझे लूटे चला जाएगा मेरा बाग़बाँ कब तक